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Thursday, July 16, 2015

साँझ और सवेरा

चली साँझ अपनी झोली में ले, सारे दिन के तम ;          
 लिए दुःख दर्द  झोली में सबके, सारे दिल के ग़म ! 
 उलट सारे दर्दों को सुबह खुशियाँ लेकर' आएगी , ,,
 नए सूरज संग भागे सबके,  सारे दिल के ग़म !!!

Wednesday, July 15, 2015

रुई हरीखा वादळा फर फर उड़ो थें मटक्या मटक्या !
थाएँ चुरई माटी से  बूंदां  भारी हुया अटक्या भटक्या !!
तन रा काला थें मतवाला थें जग रा पालन हारा हो , ,,,,
वरसई भी दो जो लाया क्यों दिखाओ लटक्या झटक्या !!! .....


बग्दो बर बर जावै पालीथीन, बरी ने भी नी बरै ; 
बारते रो रावण बरे माय रो, बरी ने भी नी बरै ! 
कई नष्ट करूँ ने कणी तरै !!! प्लास्टिक रा अमिकुण्ड ने ,
मानव जीवन जठा हुदी रावण, बरी ने भी नी बरै !!

Tuesday, July 14, 2015

 दया .... 


हर जीव में दया है इंसान क्यों दूर हो गए ;
दानवता के रक्त बीज नीच मशहूर हो गए !
नूर लेकर जन्मे लिए बालक  बेनूर हो गए ;
खुद ही अपनी खुदी में क्यों मगरूर हो गए !!

जहाँ प्रेम होगा जन एक दूसरे को समझेंगे ;
भुवन को जानेंगे जग को अपना समझेंगे !
दया से धर्म उपजा है उसको ''मूल'' समझेंगे;
उगते अंकुर को सींचेंगे  तत्व को समझेंगे !!

दया दया चिल्लाने से दया नहीं है मिलती ;
पलती बढती दया दिलों दीप सी है जलती !
पीड़ा  मरहम लगाती जखम भी है सिलती ;
बून्द बन जमती  कतरा बर्फ सी है गलती !!

भीख दया की मत मांगो स्वाभिमान जगाओ ; 
राम कृष्ण नानक की धरा अभिमान जगाओ !
मिलन के गीत गाओ सुख का परचम लहराओ ;
दया सिर्फ कहो मत दया जीवन में अपनाओ !!

Saturday, July 11, 2015

बारिश बाद सुहानी भोर धुली धुलाई आई है !
चली ठंडी  हवा बादलों में अरुषी मुस्काई है !!
अभी बरस उठेगा कोई बादल भूला भटका सा !
रिम झिम गीत सुनाती सावन की बदली छाई  है !!

Friday, July 10, 2015


बे बहर धमाल 



हद जुदाई की रही, विसाल हो गया देखिए ;
आज हद से पार हूँ, कमाल हो गया देखिए !

वो उम्र भर नाउम्मीदी के जख्म ढ़ोते रहे ;
ज़ख़्म देता कौन है, सवाल हो गया देखिए !

दौलतें इंसानियत की दामन भर के ले चले;
कौन साथी नेक दिल ? बवाल हो गया देखिए!

कौन जाने आफताब कब तलक फलक पर रहे ?
शाम के आते यहाँ जवाल हो गया देखिए !

राह नेकी की चला मैं जीतने के वास्ते ;
राह बन मंजिलें थी निहाल हो गया देखिए !

मुश्किलों के दौर में किसको पुकारूँ क्या करूँ  ? 
मौन हो कर वक्त भी, निढाल हो गया देखिए !  

आइना भी पूछता है कौन तू क्या नाम है ?

अब खुद से मिलना भी मुहाल हो गया देखिये  !       

Wednesday, July 8, 2015

गया वक्त … 


वक्त ए पीरी और शबाब चाहता हूँ:
बुझी हुई आँखो में ख्वाब चाहता हूँ !

गया लम्हा अब कभी नहीं आएगा ;
गुजरते पलों से मैं गुलाब चाहता हूँ !

मह - जबीं दिल के करीब थी तुम ;
फिर से वो शबे महताब चाहता हूँ !

मजे ले सुनते किस्सा जोश ए इश्क; 
मेरे चाँद से ही मैं हिजाब चाहता हूँ !

सुकून आज न सुकून कल ही होगा ;
भटकने दे मुझे मैं इज्तिराब चाहता हूँ! 

बना अपनी यादों का प्यारा ठिकाना ;
कैसे कहूँ मैं सब्र ओ ताब चाहता हूँ !!!.... तनुजा ''तनु ''