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Friday, January 8, 2021

माँ



मन पीड़ित तन रीतता,  इस दुनिया के बीच ; 
वे ही जन बैरी हुए,       जिनको पाला सींच  ! 

जब जब सुत की सुध जगे, बिसर जाय निज भान ;
नहीं सुध भूख प्यास की,ना सुख दुख को ज्ञान ! 

 मन आशा मेरी पिसी, चकिया के दो पाट ;
अँखियन जल झर झर बहे, देखत सुत की बाट !

सुत बिन जी नाही लगे, पल पल लागे भार ;
पलकों से काँटे चुनूँ  ,   सुत पथ रहूँ निहार !.... ''तनु''








Thursday, January 7, 2021

मैं ज़र्रा हूँ ज़र्रा ही रहने दें;

 मैं ज़र्रा हूँ ज़र्रा ही रहने दें;
वक़्त को अपनी कहानी कहने दें!

वादियों में सदाएँ सदियों से हैं;
बात जहां की उन्ही को कहने दें!

नहीं थमेगी कभी रफ़्तार उसकी;
बहता है वक़्त बेलोस बहने दें!

आग पानी में नहीं लगती कभी;
कोशिशें ये नाकाम हैं रहने दें!

झूठ की बुलंदियाँ रह न पाएँगी;
कुछ साँच की आँच तो सहने दें! 

आह भरने ना दे झिंझोड़ देगा;
चल उसकी नज़ाकतों को गहने दें!

जिन को पता अर्श का, ना फर्श का;
बहुत मासूम हैं न, अभी रहने दें!

''तनु'' इक अना इमारतें चढ़ती गयी;
 कभी गिरा उसे बेख़ौफ़ ढहने दें!... ''तनु''


Tuesday, January 5, 2021

जानते हो जवाब सवाल क्यों रखा है

 

जानते हो जवाब सवाल क्यों रखा है ?
झूठ का ये फितूर पाल क्यों खा है ?

चल नहीं सकते तुम बिना सहारे के;
फंदा आसमान पर डाल क्यों खा है ?

जो सोचा नहीं जुबान पर लाने वाले ;
कह दो दिल में सम्हाल क्यों खा है ?

धीरे - धीरे बदली तो है ये दुनिया ;
अफसाना ज़ेहन में, ज़लाल क्यों खा है ?

आँसूओं और ग़म का हिसाब रखने वाले ;
सलीब उठा कर चल हम्माल क्यों खा है ?

आँख छलकी आदतन ही हँसते - हँसते ;
ख़ामख़ा रुमाल का इस्तिमाल क्यों खा है?

बाग़ आबाद नहीं वीरानी सी कैसी है ?
दोस्त मुनाफ़िक़ हुए हलाल क्यों खा है?

गर जुगनू चराग़ों को मात देने लगे ;
बात ही बात में ''तनु'' बवाल क्यों खा है?...''तनु''.

Saturday, January 2, 2021

तुम ही नहीं आये रोती रही आँखें

 

तुम ही नहीं आये रोती रही आँखें;
यादों का दामन भिगोती रही आँखें!

बाग में कैसी आज ये हवाएँ चली;
आँसू संग हार पिरोती रही आँखें!

जाने किस पथ भटका है लश्कर मेरा;
फिर बीज चाहत के बोती रही आँखें!

आस पर मेरी पाबंदी की बेड़ियाँ;
मैं पगलाया, पगली रोती रही आँखें!

सहरा किसी दिन समंदर हो जाएगा;
बूँद-बूँद दरिया होती रही आँखें!

दरम्यान शामों सहर के एक लमहा;
तनहा थी ''तनु'' ख़ला ढ़ोती रही आँखें! .... ''तनु''

Tuesday, December 22, 2020

अभी तो ये इब्तदा है,

अभी तो ये इब्तदा है,   कोई अंजाम नहीं है; 

भरा हुआ पैमाना है,  ये खाली जाम नहीं है! 

हर वक़्त क्यों लगे हो खुद को सही सिद्ध करने में , ,,

जिंदगी तो जिंदगी है,   कोई इल्जाम नहीं है !!.... ''तनु''



Sunday, December 20, 2020

अब तो इस संसार से, मुक्ति धाम की गेह !

 स्मृतियों के हार पहन, मौन हो गयी देह ;

अब तो इस संसार से, मुक्ति धाम की गेह !


तन पीड़ित मन रीतता, इस दुनिया के बीच ;

बरसों बरस लगा रहा, इस दुनिया से नेह !


कहाँ मिला था आसरा, यहीं कहीं है स्वर्ग ;

अब दुख का क्या काम है, बरसा हो जब मेह!


अनुभव की खेती हुई, फसल हुई भरपूर ;

जीवन संध्या काल है, उमर बन गयी खेह !


अनुभव की कीमत बहुत, इस दुनिया के बीच;

चाँदी जैसे केश हैं, उर दरिया है नेह !


जिनका नव संसार है, जीवन जिनका फूल ;

मुदितमना विहसित रहें, कभी नहीं हो छेह !.... ''तनु''





Tuesday, December 15, 2020

आँसू आँखों में डबडबाते हैं


आँसू आँखों में डबडबाते हैं; 
नीचे गिरने से हिचकिचाते हैं

हर तज़ुर्बा सबक़ सिखाता है; 
रोते रोते कभी खिलखिलाते हैं!

अंजाम चाह कर नहीं मिलते; 
हार से डर कर डगमगाते हैं!

आशियाना यूँ उजाड़ने वाले ;
देखते हैं क्या, गिड़गिड़ाते हैं !

क़ायदा रखते तो ये नहीं होता; 
टूटते कौल, दिल कसमसाते हैं !

नींद से डरना कभी नहीं वाज़िब;
ख़्वाब नींद में  ही दनदनाते हैं !

आज़माईश असीर पर कैसी? 
जो परिंदों सा फड़फडाते हैं ! ... ''तनु''