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Friday, October 31, 2014

राम की तरह   

आँसू की एक बूँद के साथ  -- है हँसी का इन्द्रधनुष !
इन्द्रधनुष के रंगों में खो जाता है जीवन का कलुष !
ख़ुशी में न उछलो गगन,यूँ गम में न डूबो दो चमन,
राम की तरह रहो निकालो न कामनाओं का जलुश !!… ''तनु''

महानगर 
शरद की खुली खुली सी शाम  वो !
जेठ की जली जली  सी घाम वो !!
भागना ही जिंदगी है यहाँ की ,
कहाँ ?? सुहानी अवध की शाम वो !!… ''तनु ''

Thursday, October 30, 2014

हँसी तो पाहुनी थी ------  थी कैसे रुकती ?
इन्द्रधनुष की सहेली थी---  कैसे झुकती ??
पल में ही उजड़ गया --- सपनो का जहां,,,,,,
छोड़ गयी रोती अंखियाँ---- कैसे दुखती  !!!.... ''तनु ''
हँसी आकाश की , सितारों में चमकती है !
हँसी सागर के तट   मोती ले बिखरती है !!
सूरज पूछता ? एक किरण देकर धरा को,,,,,
बता हँसी तेरी क्या ओस में दमकती है ??''तनु ''

मित्रों नमन !!!

पाठ :-5  

हम यहां थे……… जब अर्ध व्यंजन शब्द के प्रारम्भ में आता है तब भी यही नियम लागू होगा यानि अर्धव्यंजन की मात्रा गुम हो  जायेगी …
समझें  .... 

स्नान  = २,१ 

अब इससे आगे -----

मित्रो नमन !!!हम व्यंजन और अर्धव्यंजन के बारे में जान चुके हैं अब आगे 

हमने जाना जब अर्ध व्यंजन शब्द के शुरू में आता है तो भी यही नियम लागू होता है यानि अर्धव्यंजन की मात्रा गुम हो जाती है उदा -स्नान २,१ 
एक शब्द धर्मात्मा है ये इस प्रकार गिना जाएगा --धर्मात्मा-धर /मात /मा---२,२,२ 
कुछ अपवाद भी---अगर व्यंजन से पहले लघु मात्रिक अक्षर हो पर उस पके ऊपर लघु व्यंजन का भार नहीं पड़ रहा हो तो पहले लिखा गया वर्ण दीर्घ नहीं होगा उदा…… कन्हैया   ……१,२,२ में न के पहले क है फिर भी यह दीर्घ नहीं होगा क्योंकि उस पर न का भार नहीं पड़ रहा है  …

संयुक्ताक्षर जैसे =क्ष ,त्र ,ज्ञ ,ध्द ,द्व, ड्व आदि दो व्यंजनों के योग से बने होते हैं इसलिए ये दीर्घ मात्रिक हैं लेकिन मात्रा गिनती में खुद लघु होकर अपने पहले आने वाले लघु व्यंजन को दीर्घ कर देते हैं या पहै का व्यंजन स्वयं दीर्घ हो  स्वयं लघु हो जाते है
 आइए समझें ....... 
पत्र =२,१ 
वक्र =२,१ 
मूत्र =२,१ 
शुद्ध =२,१
क्रुद्ध =२,१ 
यज्ञ = २,१ 

यदि संयुक्ताक्षर  शब्द शुरू हो रहा हो तब संयुक्ताक्षर लघु हो जाते हैं। …
आइए समझें .... 
त्रिशूल = १,२,१ 
क्रमांक = १,२,१ 
क्षितिज = १,१,१ 
व्यंजन स्वयं दीर्घ हो तो भी दीर्घ स्वर युक्त संयुक्ताक्षर दीर्घ माने जाते हैं 
आइये समझें .... 
प्रज्ञा =२,२ 
राजाज्ञा =२,२,२ 
सबके समझ में आसानी से आ जाए इसलिए ये लेख.…  ''मात्रा गणना विधान'' अति सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत किया है। …
… 
अब कुछ शब्दों की मात्रा देखते हैं 
 छंद = २,१
 विधान =१,२,१ 
 तथा = १,२ 
 सयोग = २,२,१ 
 निर्माण =२,,२,१ 
 सूत्र =२,१ 
 समझना =१,१ ,१,२,
 सहायक =१, २,१,१ 
 चरण=१,१,१ 
 अथवा= १,१,२ 
 अमरत्व १,१,२,१

''मात्रा  गणना  विधान ''   के  अपवादों पर अगर कोई कुछ कहना चाहे तो पाठ बनाकर प्रेषित कर सकता है क्योंकि ये बहुत विस्तृत विषय है


मैं बेटी बन 
दुर्गा बन गयी हूँ 
शरण माँ की …

आभारी हुई 
धन्य भाग हमारे 
स्नेहसिंचन 

संस्कार नहीं 
आत्म मंथन नहीं 
सब है खोया ''तनु ''

Wednesday, October 29, 2014

जाने कुटिल सी क्यों हँसी आज तुम्हारी है,
बात की बात न , यूँ बनी बात तुम्हारी है !
करो मर्सिया ख्वानी तुम जिगर पे रख पत्थर ,
हूँ नाशाद !!! जो खूं सनी रात तुम्हारी है !

यूँ बेपरवाह जिंदगी न जियो लानत है ,
जानते नहीं उसूलों की भी कीमत है !
उसूलों से तुम्हारी मुस्कान मुस्कान है,
नहीं तो जिंदगी में लग जाती दीमक है !!

कोई जब पास होकर भी पास नहीं ,
हंस लो अपने पर तुम भी खास नहीं !
राह में जिसके भटकना ही लिखा हो ,
मंज़िल उसकी पास होकर भी पास नहीं !

घबरा के मर जाना  इतना आसान नहीं !
हर जगह मिलता ये मौत का सामान नही!!
काश वो हँसके  कहते के  मैं तुम्हारा हूँ ,,,,,,,
फिर मिलता या मिलता उनका दामान नहीं !!!

ये मुश्किल की घडी है हमें हंसी नहीं आती !
अब याद तुम्हारी मेरे दिल से नहीं जाती !!
कहो कहाँ जाके अब ये दिल की कहूँगा मैं ! 
बिन  तुम्हारे कोई सूरत नज़र नहीं आती !!.... ''तनु ''