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Friday, November 14, 2014

बाल दिवस विशेष हैं !
कामनाएँ अशेष है !!
बच कर ही रहना सब,
बच्चा बनना शेष है...''तनु ''

Thursday, November 13, 2014

मित्रों नमन !!!

पाठ - ८ 
कविता रचने की आधारभूत जानकारी के बाद हम फिर अपने उस पाठ पर आते हैं जहाँ से शुरुआत की थी यानि छंद के बारे में  ………………:)

प्रत्येक पंक्ति पद कहलाती है विश्राम के आधार पर चरण का निर्माण होता है.… विश्राम नहीं चरण नहीं। चरणों के बारे में हम पिछले पाठ में समझ चुके हैं.............. 


दो पंक्ति द्विपदी कहलाती है। 
चार पंक्ति को चतुष्पदी कहते हैं। 

ये मेरा दुस्साहस ही कहें  कि  मैं इस विषय पर विवेचना लिए आप के साथ हूँ क्योंकि छंद  समूह में अभी तक ऐसा कोई लेख प्राप्त नहीं है जिस में छंद के मूलभूत तत्वों पर चर्चा हुई हो मुझसे अगर कोई भूल हो जाए तो आप सभी मेरा मार्गदशन करें। 

छंद क्या हैं ?  छंद कविता है पद्य है जो गणना में बंधा है। भाषा शब्द वर्ण और स्वर मिलकर एक निश्चित विधान में सुव्यस्थित होकर छंद बनाते हैं। इस प्रकार छंद की परिभाषा …… 
ये हुई................... 

''सामान्यतः वर्णों और मात्राओं की गेयव्यवस्था को छंद कहा जाता है'' ....

छंद  तीन प्रकार के  होते हैं  
आइये समझें…………… 

१ -  वार्णिक छंद   -   ऐसे छंद जिनकी रचना वर्णों की गणना नियमानुसार होती है उन्हें ''वार्णिक छंद ''कहते हैं। 

२ - मात्रिक छंद  - जिन छंदों के चारों चरणों की रचना मात्राओं की गणना के अनुसार की जाती है उन्हें मात्रिक छंद कहते हैं। 


३ - अतुकांत और छंद मुक्त  -ऐसे छंद जिनकी रचना में वर्णों और मात्राओं की संख्या का कोई नियम नहीं होता उन्हें छंद मुक्त काव्य कहते हैं ये तुकांत भी हो सकते हैं और अतुकांत भी। 

प्रमुख मात्रिक छन्द - 
चौपाई, रोला, दोहा, सोरठा, कुण्डलिया ये मात्रिक छंद हैं 
चौपाई -
चौपाई के प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ होती हैं तथा चरणान्त में जगण तगण नहीं होता 

उदाहरण - देखत भृगुपति बेषु कराला 
          २११  ११११   २१ १२२                  (१६ मात्रा )
         उठे सकल भय बिकल भुआला 
         १२ १११ ११ १११ १२२                    ( १६ मात्रा )
         पितु समेत कहि कहि निज नामा 
           ११ १२१ ११ ११ ११ २२                (१६ मात्रा )
          लगे करन सब दंड प्रनामा 
          १२  १११  ११  २१  २२२               (१६ मात्रा )


रोला -रोला छंद में २४ मात्राएँ होती है ग्यारहवीं और तेरहवीं मात्राओं पर विराम होता है अंत में दो गुरु होने चाहिए। 
उदाहरण 
'उठो–उठो हे वीर, आज तुम निद्रा त्यागो।
करो महा संग्राम, नहीं कायर हो भागो।।
तुम्हें वरेगी विजय, अरे यह निश्चय जानो।
भारत के दिन लौट, आयगे मेरी मानो।।
--।  ऽ ।-।  ऽ-।  ऽ--ऽ  ऽ-ऽ  ऽ-ऽ (२४ मात्राएँ)

दोहा - इस छंद के पहले तीसरे चरण में १३ मात्राएँ और दूसरे और चौथे चरण में ग्यारह मात्राएँ होती हैं पहले तीसरे चरण का आरम्भ जगण से नहीं होना चाहिए और सम चरणों के अंत में लघु होना चाहिए।
उदाहरण -

आ रही और जा रही,        उमड़ घटा घनघोर !
बिजुरी मन चमकत रही, छम छम नाचे मोर!!… ''तनु ''

सोरठा -छंद के पहले और तीसरे चरण ग्यारह ग्यारह और दूसरे और चौथे चरण में तेरह तेरह मात्राएँ होती हैं। इसमें पहले और तीसरे चरण में तुक मिलने चाहिए। यह विषमान्त्य छंद है 
उदाहरण-
रहिमन हमें न सुहाय, अमिय पियावत मान बिनु। 
जो विष देय पिलाय,    मान सहित मरिबो भलो।। 
ऽ  ।-।  ऽ-।  ।--।              ऽ-।  ।--।  ।--ऽ  ।-

कुण्डलिया -कुंडली या कुण्डलिया छंद के शुरू में एक दोहा और उसके बाद इसमें छः चरण होते हैं प्रत्येक चरण में २४ मात्राएँ होती हैं दोहे का अंतिम चरण ही रोला का पहला चरण होता है इस छंद का पहला और अंतिम शब्द भी एक ही होता है। … 
आइये समझें
 दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान।
चंचल जल दिन चारिको, ठाऊँ न रहत निदान।।
ठाँऊ न रहत निदान, जयत जग में जस लीजै।
मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही की कीजै।।
कह 'गिरिधर कविराय' अरे यह सब घट तौलत।
पाहुन निशि दिन चारि, रहत सबही के दौलत।

हमने आज मात्रिक छंदों के बारे में समझा प्रतिक्रिया अवश्य हो। 





Wednesday, November 12, 2014

एक मुक्तक  

''बिना मापनी ''

कुचलते हो गुलशन में गुलों को खारों पर ?  अर्क न करो !
लग चुकी कश्ती  अब           किनारों पर ?  गर्क न करो !
नतीजा न निकले  ऐसी बातों पर बहस से क्या हासिल ??? 
वक्त की कदर करो  बेमतलब मुद्दों पर ?  तर्क न करो,,,,,…''तनु ''

Sunday, November 9, 2014

राम की तरह रहो निकालो न कामनाओं का जलुश !
इन्द्रधनुष के रंगों में खो जाता है, जीवन का कलुष !!
ख़ुशी में न उछलो गगन,यूँ गम में न डूबो दो चमन,
आँसू की एक बूँद के साथ  -- है हँसी का इन्द्रधनुष !… ''तनु''
पाठ ७

मित्रों  नमन !!!

पिछले पाठ में हम ये जान गए गति, यति, चरण, तुक और मात्रा क्या हैं।  आइये आज हम गणों को जाने समझें 
गण :-  छंद के बनाने में लघु गुरु के सहयोग से गण का निर्माण होता है। ये गण संख्या में आठ होते हैं इन आठों गणों  को मुँह ज़बानी याद रखने के लिए एक सूत्र है जिससे इनको समझना आसान हो जाता है वह है। .... 
आइए समझें 

सूत्र :-  य  मा  ता  रा  ज  भा  न  स  ल गा 

आखिर के दो वर्ण 'ल' और 'ग' छंद शास्त्र के दग्धाक्षर हैं  दग्धाक्षर झ ह र भ और ष ये पाँचों अक्षर दग्धक्षर हैं इनको छंद के आरम्भ में रखना वर्जित है ( पिंगल के अनुसार )   महर्षि पिंगल अपने समय के महान लेखकों में गिने जाते थे। इन्होंने 'छन्दःशास्त्र' (छन्दःसुत्र) की रचना की थी। इनका जन्म लगभग 400 ईसा पूर्व का माना जाता है। कई इतिहासकार इन्हें 'पाणिनि' का छोटा भाई मानते है।
गण’ का विचार केवल वर्ण वृत्त में होता है मात्रिक छन्द इस बंधन से मुक्त होते हैं।

सूत्र सारिणी 

य - यगण - यमाता - १२२ -   दवाई  , नहाना --  शुभ 
मा - मगण - मातारा -२२२ - बादामी,आज़ादी  -- शुभ 
ता - ताराज - तगण - २२१ - आधार,चालाक  --  अशुभ 
रा - राजभा -  रगण - २१२ - आदमी ,पालना --- अशुभ 
ज - जभान - जगण - २१२ - मकान, करील  --- अशुभ 
भा - भानस - भगण -२११ - मानव , बादल --    शुभ 
न  -  नसल - नगण - १११ -  नयन ,कमल ----  शुभ 
स  - सलगा - सगण - ११२ - चरखा ,कमला --- अशुभ 

जब भी हम छंद या कविता करें तुकान्तता का ध्यान रखें इसके अभाव में लालित्य और प्रस्तुतीकरण में कमी आ जाती  है सिर्फ मात्राएँ, गति, यति ही ध्यान में नहीं रखी जाती वरन तुकबंदी भी ज़रूरी है और तुकांतता का ध्यान रख जाना अत्यंत आवश्यक है पदों और पंक्तियों का अंत भी नियमानुकूल हो। इस तथ्य का ध्यान रखा जाना आवश्यक है. 

तुकांतता का निर्वाह करते समय केवल अंत वाला अक्षर ही नहीं मिलाया जाता बल्कि स्वर के अनुसार शब्द को भी मिलाएँ।   तीन प्रकार की तुकान्तता होती है ---उत्तम मध्यम और निकृष्ट। .... 

वाचन करते समय स्वरों और शब्दों के न मिलने पर कविता कर्णकटु लगाती है प्रवाह टूट जाता है अंत के ठीक पहले कोशिश करें कि समवर्णी अक्षर हो पर और अगर समवर्णी न मिल पाये तो कम से कम सामान स्वर हो ताकि सुनने वालों को कर्णकटु न लगकर आपकी रचना  सरस लगे और पढने वालों का प्रवाह न टूटे ।  


आइए समझें 

उत्तम तुकान्तता होगी 
आवत जावत ,--आइए  जाइए ,--बरसत सरसत ,--कुआँ धुआँ ,--मोहित लोहित। …… 

माध्यम तुकान्तता होगी 
बुझना कूदना ,--सहारा सकारा ,--पुकार मज़ार ,---जानत पिवत। ....... 

निकृष्ट तुकांतता होगी 
कहिये खोइए ,----समर कहार ,----उचित सुनत ,---उघरत विलसित। 

आज हमने गणों और तुकान्तता के बारे में समझा आशा है आपको ये पाठ रोचक लगा होगा। 


विनय सहित 
तनुजा ''तनु ''











Saturday, November 8, 2014

इंतज़ार नहीं !!! सुबह  आ  धमकी ढेर काम लिए, 
वक्त नज़ाकत से चल रहा था मन में अरमान लिए ,
क्यों भूलना कठिन है ?  क्यों याद रखना कठिन  ,
सुबह !! सुबह !!  योजना रात ही सारे सामान लिए..... ''तनु ''






आस का फूल
कहीं धुआँ हो जाए
 बारूद ढेर