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Saturday, May 30, 2015

सफर की तैयारियां ,        ये कैसी हो गयीं 
जिगर की बेताबियाँ         ये कैसी हो गयी  
क्या हुआ जो अब ना हम मिल पाएंगे कभी   
सिफर की निशानियाँ ,       ये वैसी हो गयी ''तनु ''

Friday, May 29, 2015

दोस्त 

यार दोस्ती में----- मैं नादान, बन गया ;
मैं मानता हूँ ------ मैं इंसान, बन गया !

हश्र में भी ---   निगाहें  तेरी तरफ ही थी;
ना जाने फिर क्यों तू अनजान, बन गया ! 

देखा किये हमें ,----  हँसते रहे हमीं पर ;
क्यों सोचते थे सब तू इंसान ? बन गया !

सोच रहा झुक कर, तू दस्त थाम लेगा;
मुँह फेर लेना तिरा अरमान,  बन गया!

लेकर  चला  हूँ,      मैं कश्ती कनारे पे ;
साहिल तुझे समझा तूफ़ान, बन गया !!! , ,,.... ''तनु ''

ये कैसी आई   है   आफत,पता नहीं ;
खुदाया वो  भी है सलामत पता नहीं!

दर - ओ - दीवार वही, जाने ना निस्बत !                   
किससे करूँ अब मैं शिकायत,पता नहीं !!

इसी बस्ती में, ------रूह पनाह लेती थी !
क्यों वो लिए बैठे अदावत , --पता नहीं !!

जख्म यादों के दिए,----- मेरी आँखों को !
आँखें  रोकर करे बगावत,---- पता नहीं !!

शब  भी  सायों  से  पनाह  माँगती  रही !
चाँद क्यों ना बन सका चाहत, पता नहीं !!

समन- ज़ार  से आबाद थी मज़ार मिरी !
''तनु'' छोड़ दी किसने शराफत, पता नहीं !!

समन- ज़ार = चमेली के फूलों से ढँकी  हुई 
निस्बत   = रिश्ता    




Thursday, May 28, 2015


बूँद थी नायाब आब की,  वो चम - चम चमकती !
ताब थी पात पर आब की, वो दम - दम  दमकती !!
मंद पवन की आई हिलोर लगी डोलने यूँ   ,,,,,,,,
बूझ तो पहेली आब की ,  हूँ गम - गम गमकती !

Tuesday, May 26, 2015

असीम विश्वव्यक्तित्व 


मानव तू ऐसी सभ्यता का अग्रणी हो ;
जिसके हाथ किसी के खून से न खुनी हो ! 
गौरवान्वित तू हर धर्म से कि ईश्वर है , ,, 
दिल में स्थान और बाहों का बाहुबली हो !! 

तू कृष्ण बन के आ,   या तू ईसा हो ; 
देश काल न कोई सीमा,   न दिशा हो ! 
विकास का तू अनंत प्रकाश बन कर , ,,
असीम हो तू ईश्वर के सरीसा हो !!  

निरीश्वरवादी जैन,         वाणी न बैचैन हो ;  
वस्त्र बना दिशाओं का,   अमृत भरे नैन हो ! 
केंद्रीय सत्य है,    मनुष्य में ईश्वरत्व बन , ,, 
धर्म ऐसा रौशनी समान और मीठे बैन हो  !!

मूर्ति रूप को प्रणत हो,  या प्रकाश का रूप हो ;  
ये अगियारी हो आग की या सूरज की धूप हो ! 
कहीं न रुक तू, प्रार्थना साधना साक्षात्कार से , ,,  
अग्नि तारा चन्द्र सूर्य,   ईश्वर का ही रूप हो !!  

मंदिर अगियारी या तू मस्जिद को जाता हो ;
जान ले व्यवहार तेरा हर इंसान को भाता हो !
धर्म आतंरिक प्रतीक हो या बाहय प्रतीक हो , ,,
शमा जला प्यार से रास्ता दिल को जाता हो !!

एक ज्योति, रंग अलग, धागा एक, मनके अलग हो ;
वो एक है!! नाम कई ,  नाम !! हर जन के अलग हो !  
सत्य अहिंसा की राह,  हर धर्म की राह है , ,, 
जान लेना ये जान कैसे ?? हर तन से विलग हो !!




???

लो ''भैरवी'' रोई ''भूप'' न छोड़ा;
धर्म का क्यों-- कोई रूप न छोड़ा ?

हिन्दू जागे  !! मुस्लिम जागे  !!
सिक्ख जागे  !! ईसाई जागे  !!
जाग मानव असुर बन गए, ,,,
सुर को खो बे- सुर बन गए.…  
मानव का क्यों स्वरूप न छोड़ा ?
लो ''भैरवी'' रोई ''भूप'' न छोड़ा;

नदी नीर है --- सागर भरा है;
सावन भादों --- नीर झरा है!
नीर के कितने घोल बन गए, ,,,
कड़वे  मीठे बोल  बन गए  
नीर का क्यों स्वरुप न छोड़ा ?
लो ''भैरवी'' रोई ''भूप'' न छोड़ा; .......

धर्म में क्यों--- बेजुबान मरे;
धर्म में क्यों ---ये जुबान डरे!
बदली के अश्क खुश्क हो गए,  ,,
गरजते गरजते  इश्क रो गए 
हवा में धुँआ क्यों धूप न छोडा ?
 लो ''भैरवी'' रोई ''भूप'' न छोड़ा;,,,,,,,,

प्रेम की ---- आवृति खो गयी;
विष बुझे --- बाण चुभो गयी !
मन आहत हो दग्ध हो गए , ,,,
बन चाहत विदग्ध हो गए  
बुझाने को क्यों कूप न छोड़ा ?
लो ''भैरवी'' रोई ''भूप'' न छोड़ा;....

हाथ जोड़ हम आसमां निहारे ;
गुल मुरझाये   बागबां निखारे! 
बिना खिले गुल सुप्त हो गए 
विध्वंस पर ही मुग्ध हो गए, ,,
मस्जिद शिवाला स्तूप न छोड़ा ?

लो ''भैरवी'' रोई ''भूप'' न छोड़ा;
धर्म का क्यों कोई रूप न छोड़ा ?







  

Sunday, May 24, 2015

 समय कटा,
 अपने आप !
''विषय'' है,
 लहराता साँप !  
 घिस कर घुन,
 ''पूर्णमिदं''!!
 आदि ही इति, 
 इदं इदं !!
 हृदय  को, 
 मुसकान पाटती !
 सूरत को ,
 आँखें निहारती !
 हथेली,
 सूरज की उम्मीद! 
 चल राही,
 धरा पुकारती !!
 वलय  खींच
 मलय न बाँध 
 संयम की 
 सीमा न लांघ 
 मन ही है, 
 वह परकार !
 मन से बंध ,
 मन न रांध !!