एक मोती , ,,, किरण किरण मर गयी लो धूप का अनंग है ; बूँद-बूँद भगीरथी महिमा अनूप गा मृदंग है ! दीप की कई शिखाएँ लिए आराधन है मेरा , ,, पूरित स्नेह , लुब्ध हूँ, मुग्ध हुआ मनवा पतंग है !! .. ''तनु''
अपना मकसूद औ माबूद भूला , ये तो मंज़िल तेरी नहीं थी !! उमीदों का मुंतहा और को बनाया, ये तो मंज़िल तेरी नहीं थी !! कैसे रब का नाशुक्रा हुआ तू , ये तो मंज़िल तेरी नहीं थी !! बहकावे और मक्र में उलझा, ये तो मंज़िल तेरी नहीं थी !! नफ़्स की ख्वाहिशात औ चाहतें , ये तो मंज़िल तेरी नहीं थी !!... ''तनु ''