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Tuesday, July 8, 2014
एक ख़्याल
पर बड़े प्यार से
खड़ा सवाल ..''तनु''
Monday, July 7, 2014
नीर की बदली--- छलक भी जा ,
धरणी का सीना--- छीजा छीजा।
अपलक राह------- निहारे नैन ,
पांवड़े पलक------- बिछा बिछा , --''तनु ''
कितने शरारों शोलों से जला हुआ हूँ ,
न तू गिन, फफोले हैं मेरे जिगर में.
सब गैर हैं और तूफान देखता हूँ ,
राहें मुख्तलिफ, एक मंज़िल है सफर में.
ये किसकी!!! इनायतों ओ रहम का दौर है,
रोती है जीस्त शाखों की भीगी सहर में.
इक फलक ही था जो इस बात का मातम करता ,
इक नदी ही थी बहाती खूनाब चश्मतर में। .... "तनु "
इक फलक ही था जो इस बात का मातम करता
इक नदी ही थी के बहाती खूनाब चश्मतर में…''तनु "
Sunday, July 6, 2014
बुतक़दे मैं हैं चिराग क्यूं रौशन ,
गर तुम कहीं हो तो सामने आओ।
साज जो टूट गया वो अब बजे कैसे ,
जाहिद हूँ मैं मेरी बंदगी को न झुठलाओ।
जिद न देखो तूफा की कहर में है जां ,
नाखुदा न हो तुम लंगर न उठाओ।
अभी चार दिन ही का तो दोस्ताना है ,
कोई मतलब की बात उनको न बताओ।
दिल पे अन्धेरा है और रूखे रौशन है ,
खुदा न हो यहाँ कोई अहरमन तो मनाओ ।
जमीन ओ अर्श पे था जिनका दबदबा कायम ,
सभी फानी यहां कोई कामिल रहरव को बुलाओ। ………"तनु"…
तू गैर है ये मैं मानता हूँ ,
दुश्मन है तू मैं जानता हूँ ,
दोस्ती भी दुश्मनी की बगल में है!!!
बा अदब उसको निहारता हूँ ,,,,,,,,,,,,"तनु "
ये कैसा सृजन ??
मन की अकुलन ,
शब्दों का दर्द लेखनी में
हो गया आंकलन………"तनु"………
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