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Wednesday, November 5, 2014

दोहे 

मोर मोर ही कह रहे , बना उसे सिरमोर !
जाने है विधना यही, बहे आँख घनघोर !!

मोर पपीहा चातकी , बात बिना मशहूर ! 
मेरे मन की क्या कहूँ, रोय गंवाया नूर !!

मोर बिना बादल नहीं, बादल बिन बरसात !

जिन नैनन आँसू रहे,   बिन बादल बरसात !!

आ रही और जा रही,        उमड़ घटा घनघोर !
बिजुरी मन चमकत रही, छम छम नाचे मोर!!… ''तनु ''



Tuesday, November 4, 2014

राहू की महादशा में हो जाते भ्रम हैं
दिनचर्या टूटती है और टूटते क्रम हैं
ईलाज नाकाफी होता दिल नासाज हो
नहीं आराम राहत कहाँ बढते श्रम हैं ''तनु ''

Monday, November 3, 2014

मित्रों नमन !!!

मत्तगयन्द सवैया छंद---- पाठ -२
कल के मत्तगयन्द सवैया छंद की जानकारी अधूरी रहेगी अगर उसमें ये न बताया जाए .......


मत्तगयंद सवैया छंद में चार पद होते हैं और सभी तुकांत होते हैं , जब तक कि किसी प्रयोजन विशेष के चलते रचनाकार ने कोई नवीन प्रयोग किया हो.…………  

एक उदाहरण लेते हैं -

सीस पगा न झगा तन में प्रभु ,जाने को आहि बसै केहि ग्रामा। 
धोति फटी -सि लटी दुपटी अरु ,पाँयउ पानहि की नहि सामा।। 
द्वार खरो द्विज दुर्बल एक रह्यौ चकि सौ वसुधा अभिरामा। 
पूछत दीन  दयाल को धाम , बतावत आपणो नाम सुदामा।।
  
सीसप       २११ 
गानझ      २११ 
गातन       २११ 
में प्रभु       २११ 
जानै को    २११ 
आहिब      २११ 
सै केहि      २११ 
ग्रामा          २२ 

ध्यान से देखा जाए तो पांचवे भगण में कुछ अनियमितता एक अस्पष्टता सी झलकती है   .... जानैको- भगण न होकर मगण प्रतीत हो रहा है किन्तु हम जब पद को गाते हैं तो वाचन प्रवाह के अनुसार ये शब्द ''जानै को '' जानक ही पढ़ा जाएगा न कि ''जानैको ''

इसी प्रकार अब सातवाँ भगण देखिये यहाँ ''सैकेहि'' को सैकहि पढ़ा जाएगा …  

अगर उदाहरण के अन्य पदों को देखें तो .......... 

धोति फटी -सि लटी दुपटी अरु ,पाँयउ पानहि की नहि सामा।। 

ध्यान देने वाली बात ये है कि धोती को धोति--- फटी-सी को फटी -सि तथा नहीं को नहिं लिखा गया है इसे अक्षर दोष की तरह न देखकर छंद उच्चारण प्रवाह के अनुसार शब्द के अक्षर में स्वराघात में बदलते हुए उच्चारित करने पर गलती न लगते हुए सब सही लगता है। यही कारण है कि सवैये हिंदी के आंचलिक रूप को आसानी से स्वीकारते हैं अब हम समझ गए हैं कि कारक विभक्तियों के चिन्ह छंद रचते समय आवश्यकतानुसार लघु रूप में व्यवहार में आते हैं। 

प्रश्न ;- प्रस्तुत उदाहरण में लिए सवैया छंद के रचनाकार कौन हैं ?

प्रस्तुत आलेख प्राप्त जानकारी और उपलब्ध साहित्य पर आधारित है 
आइए कविवर  के मत्तगयंद  सवैया छंद का विश्लेषण करें
ये २३ वर्ण का है सात बार भगण और अंत में गुरु गुरु है
यानी मत्त गवैया छंद =भगण x ७ +गुरु +गुरु 
तुकांत  =  धरावै, जरावै,  बतरावै,  सुनावै ……  

भानस     भानस    भानस   भानस   भानस    भानस    भानस       गुरु गुरु  
२११         २११       २११     २११       २११       २११       २११          २२ 
गावत      गीतगु   पालन    आवत     गोपिन     धीरज    कौनध      रावै,  २३ वर्ण 
भानस     भानस   भानस    भानस    भानस    भानस      भानस      गुरु गुरु 
२११         २११      २११       २११      २११        २११         २११         २२ 
देकर       पीरदु     खीकर     नैनस    दामन      मेंवह      आगज      रावै २३ वर्ण 

प्रीति करें पछतावत गूजर जाकर कै जसुदा बतरावै,
लूटत है दधि माखन मोहन बांसुरि तान न नैक सुनावै।

इन छंदों का मज़ा गाकर ही लिया जा सकता है,  वस्तुतः ग़ज़ल या छान्दसिक रचनाएँ पढने की चीज़ थी ही नहीं ये श्रोताओं द्वारा सुनने के लिए लिखी जाती थी कही जाती थी लीजिये काव्यगत प्रस्तुतियों में इस सवैया का मज़ा गाकर लीजिये। 

Sunday, November 2, 2014

मित्रों नमन !!!

हमारे कुछ मित्रो ने सवैया छंद के बारे में जानकारी चाही है हो सकता है वे गणों  के बारे में जानकारी रखते हों।उनकी विशेष फरमाइश पर मैं सवैया छंद के बारे में आधारभूत जानकारी देने जा रही हूँ बाकी पाठों को आपके खातिर यथावत ही प्रेषित करुँगी ....

 एक गण को जो मूलतः तीन वर्णों के योग से बनता है जिसमें लघु गुरु मात्राएँ होती है यगण मगण  सगण आदि की सात आवृतियों के साथ लघु या गुरु वर्ण या एक या अधिक कोई  या अन्य किसी भी गण से बनी आवृति को जो कि पद बनाती है ऐसे चार पदों का समूह सवैया छंद कहलाता  है इस प्रकार एक बात तो स्पष्ट हो गयी कि.सवैया …

आइये समझें

लयमूलक
ये छंद वार्णिक होते हैं
स्वरुप तुकांत
चार पद या चरण
वर्ण २२ से २६

वर्णिक पंक्तियों को वृत्त कहते हैं २२ से  २६ वर्ण के चरण या पद वाले एक प्रकार के जाती वाले छंदों को सवैया छंद कहा जाता है ये लय मूलक है यहाँ मेने   पद व् चरण दोनों की बात कही है वह इसलिए कि कई प्रकार के सवैया होते हैं अब चूँकि ये वार्णिक होते हैं इसलिए इनमें गणों  के साथ शब्दों को स्थान प्राप्त है इस लिए इसके पद  आज की हिंदी को नहीं स्वीकारते।वाचन के क्रम में कई शब्दों की मात्राएँ गणों के अनुसार बरतनी पड़ती है जैसे   ''मन में''   बोलने का तरीका अलग और     ''मनहि'''   बोलने का अलग.....  लेकिन दोनों का अर्थ एक ही है  जैसे…'''सारे''' …'''सगरे '''  '''ही'''    '''हि ''   ''''मन''''....  ''मनवा''' ''नहीं'' ''नहिं ''इसलिए  हिन्दी  का आंचलिक रूप इसे अधिक संतुष्ट करता है सवैया छंद में रचनाकर्म  इन भाषाओं में सरल है जैसे अवधी  बृज  भोजपुरी में

आशा है आपको संतुष्टि हुई होगी …………






Saturday, November 1, 2014

मित्रो नमन !!!
पाठ 6 .

गति :-    जब भी हम कोई कविता रचते हैं उस पद्य के पाठ में जो बहाव होता है हम उसे गति कहते है

यति :-     यदि हम उस गति को उस लय को तोड़ दें यानी पद्य पाठ के बहाव में रोक लगा दें उस रोक को यति कहते हैं 

तुक :-     पद्य अधिकतर तुकांत होते हैं सामान उच्चारण वाले शब्दों के प्रयोग को तुक कहा जाता है

मात्रा :-   वर्ण का उच्चारण जब हम करते हैं उस उच्चारण में जो समय लगता है उसे मात्रा कहते हैं पूर्व में समझाया गया है लघु गुरु मात्रा  .... लघु मात्रा का मान  ''।'' …ग़ुरु मात्र का मान ''S''  …चिन्ह से प्रकट किया जाता है लघु का मान १ व गुरु का मान २ होता है। 

चरण तथा पद  :- वर्णों के सामंजस्य से जो पंक्तियाँ लिखी जाती हैं वे चरण या पद कहलाती है। 
हर कविता  में चरण या पद या चरण + पद होते हैं। 
एक पंक्ति को पद तथा  पद में यति / गति अर्थात रुकने के आधार पर चरण होते हैं 

आइये समझें 
एक दोहा ....... 
बड़ा हुआ तो क्या हुआ,   जैसे पेड़ खजूर !
पंथी को छाया नहीं,  फल लागे अति दूर !!
प्रस्तुत छंद में दो पंक्ति अर्थात दो पद हैं 
बड़ा हुआ तो क्या हुआ ,   जैसे पेड़ खजूर ! ये एक पद है 
पंथी को छाया नहीं,  फल लागे अति दूर !! ये दूसरा पद है 

इसका पहला चरण है 
बड़ा हुआ तो क्या हुआ
इसका दूसरा चरण है 
जैसे पेड़ खजूर !
इसका तीसरा चरण है 
पंथी को छाया नहीं, 
इसका चौथा चरण है 
फल लागे अति दूर !!    
इस प्रकार दो पदों में चार चरण हुए। ....  

गण  :-   वर्ण मात्रा के क्रम की सुविधा के लिए तीन वर्णों के समूह को एक गण मान लिया गया है इस प्रकार के गणोंकी संख्या आठ है -  यगण(।SS ),   मगण( SSS ), तगण( SS। ), रगण ( S।S ), जगण (।S।) ,  भगण (S।।) , नगण  (। । । ),सगण  (।।S)

गणों  को आसानी से याद करने के लिए सूत्र बना लिया गया है---- यमाताराजभानसलगा  …
ये पाठ बस यहीं तक.....  धन्यवाद मित्रो  ................ 
गणों  को हम अगले पाठ में लेंगे …
विनय सहित
कड़वा ही बोलना है ???  बोलने की जहमत क्यों ?
मनवा  कपटी  है तो ये दिखावटी खिदमत क्यों  ?? 
दाता वही …  एक ऊपर ....  उसकी बराबरी क्या ,,,,,,
सभी नाम उसका छुपा के यूँ  बाँटते रहमत क्यों  !!!… ''तनु ''