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Thursday, August 24, 2017

तीज री बधय



थाने मंगल तीज री ,  मोकळी जी बधाय !
कर सोला सिणगार जी, मेहँदी लो रचाय !!
मेहँदी लो रचाय,      आली हरले आलिका !
चरणन शीश नवाय, करो व्रत हरतालिका !!  
मंगलमय है तीज,     घणा मीठा रे सबंध !
कुमारियाँ वर पाय,  रे वे सौभाग्य अखंड !!... 'तनु' 

हरतालिका







अखंड सुभाग कामना,  गौरी पूज मनाय !
कर सोलह सिंगार मैं ,    मेहँदी लूँ रचाय !!
मेहँदी लूँ रचाय,     आली हरती आलिका !  
चरणन शीश नवाय, व्रत करे हरतालिका !!  
मंगलमय है तीज,    अपने मधुर हो सबंध !
कुमारियाँ वर पाय,  रहता सौभाग्यअखंड !!.. ''तनु ''

Tuesday, August 22, 2017

औरत





औरत तुम तो एक पहेली सी हो ;
कभी अंजान कभी सहेली सी हो !

घनी रजनी में तुम किरण भोर की ;
जलते रेगिस्तान बेला चमेली सी हो !  

पापा थके जब दौड़ पानी भर लाओ ;
 सिर सहलाती नन्ही हथेली सी हो !

जीवन की धुंध सुनहरा ख्वाब हो तुम ;

सहेजती हर चीज को हवेली सी हो !

बहन है प्यार घर का कोना महकाती ; 
लड़ती झगड़ती कभी अलबेली सी हो !

कभी प्रौढ़ बनकर, कभी शृंगार में ग़ुम ;
कभी दुल्हन बन तुम नवेली सी हो !

मिठास से मीठी तुम नीम से कड़वी ;

खटाई में इमली  कभी गुडभेली सी हो !
  
लिए वैराग्य का कोना पड़ी ठिठुरती ;
धवल धारण किये तुम अकेली सी हो !,... ''तनु ''


सवेरा



 सवेरा 

निशा का फिर सवेरा हो गया है 
अन्धेरा फिर अकेला हो गया है 

आओ मिल नीड का निर्माण हो 
प्रेम पथ पर नेह का आह्वान हो 
आ रही उन आँधियों को फेर दो 
प्राची में देखो उजेरा हो गया है 

निशा का फिर सवेरा हो गया है 
अन्धेरा फिर अकेला हो गया है 

कौन डर जाएगा यूँ  दुर्देव से 

कुनीतियाँ कुचली गयी सदैव से 
गा रहे उन पंछियो को टेर दो
आशाओं के हित बसेरा हो गया है 

निशा का फिर सवेरा हो गया है 

 अन्धेरा फिर अकेला हो गया है 

कौन कमल विहँसने से रुकेगा 

चाँद भी कुमुदिनी पर झुकेगा 
चलो बादलों, चाप इंद्र उकेर दो 
क्षितिज भी अब घनेरा हो गया है

 निशा का फिर सवेरा हो गया है 
अन्धेरा फिर अकेला हो गया है 

प्रतीक्षा का समापन नजदीक है 
क्यों निर्झर ले नयन भयभीत हैं  
श्वास ओ  सिहरे पवन ना अबेर दो 
मधुरिमा घुली !!! लो जगेरा हो गया है 

 निशा का फिर सवेरा हो गया है 
अन्धेरा फिर अकेला हो गया है 

संभावनाओं के पथ धुंधले न होंगे 
मनुज व्यर्थ वाणी से गंदले न होंगे 
आओ किरणों तुम नई सवेर दो 
भानु भोर का चितेरा हो गया है

निशा का फिर सवेरा हो गया है 
अन्धेरा फिर अकेला हो गया है , ,,, ''तनु ''






Monday, August 21, 2017

अंधी बाढ़ !






आजकल आती ही ऐसी ;
होती कभी न मंदी बाढ़ !

कई बरस में देखी होगी ;
सबने ऐसी अंधी बाढ़ ! 

हरियाली पर ये क्या बोले ;
कीचड़ के संग बंधी बाढ़ !

कर न पाया प्रतिकार कोई ;
कैसी ये प्रतिद्वंद्वी बाढ़ !

कीमत जिंदगी ने खोयी ;
क्रूर नाचती नंगी बाढ़ !

कितनी घातक कितनी मैली ;
कहाँ होती सुगंधी बाढ़ !

जाने कर्म की सजा दे रही ;
 बनी है अब तो चंडी बाढ़ !

कितना हर्जाना मांग रही ;
लेती ही जा रही खंडी बाढ़ !

कितने दरख्त कितने छौने ;
खा गयी कितने पंछी बाढ़ !

अभिशप्त हुआ है जन जन ;
तोड़ गयी सब संधि बाढ़ !

विनती नहीं किसी की सुनती ;
 निर्मम निर्दय हंत्री बाढ़ !,,, ''तनु''

बाढ़

बाढ़ 

धरती विप्लव गान गा रही 
प्राणों के लाले पड़ गए 
अंबर चीखे त्राहि त्राहि
आया तम उजाले घर गए 

लहरों की लीला देखो
जीवन को ले लील गयी 
क्षितिज अब तो डूबा डूबा 
कहाँ खो अबाबील गयी 
पेड़ फसलें बह गयी,   खेत खलिहान उजड़  गए
धरती विप्लव गान गा रही, प्राणों के लाले पड़ गए 

दूध मलीदा खाने वाले 
स्वच्छ जल को तरस गये 
रोटी कहां नसीबा में थी 
दुःख के बादल बरस गए 
जीवन देने वाला जल,  जीवन उजाड़ उजड्ड गए 
धरती विप्लव गान गा रही, प्राणों के लाले पड़ गए 


घर डूबा छत पर पहुंचे 
छत से ही देखें आकाश 
शायद कोई आ जाये तो 
पहुंचे कोई कहीं से आस 
देखो कोई बहा मवेशी, बही सड़क संग रगड़ गए
धरती विप्लव गान गा रही, प्राणों के लाले पड़ गए 

पथरा कर  पत्थर हो गये 
जल में जलहीन नयन है 
कौन डूबा गिनती नहीं है 
कुअंक लुटा रहा गगन है 
कितनी माँएं पूत बिन सोई, कितने लाल सुघड़ गये 
धरती विप्लव गान गा रही, प्राणों के लाले पड़ गए 

सुख पल के  सिंदूर बह गये 
पता नहीं वे  सुदूर बह गये  
दफ़नाने को जमीन नहीं है 
अब न आऊँगा नयन कह गये 
डूब डूब मैं डूब रहा हूँ ,जीव मौत से झगड़ गये 
धरती विप्लव गान गा रही, प्राणों के लाले पड़ गए !!... ''तनु ''














Sunday, August 20, 2017






लेखन की उनको रही,    बड़ी अनोखी चाह !
जब तब लिखा ही करते,  पकड़ कलम की बाँह !!
पकड़ कलम की बाँह,    कागज के कज्जल करे ! 
मनन  में अति उछाह        ज्योँ रीते घट जल भरे !!
कौन कहे कविराय, लिखी पोथी देखन की !
दनादन हैं कमाय,   लागी लगन लेखन की !! ,,...'तनु'